-1 -
नदी ने मुझसे कहा — ठहरना मत सीखो,
पत्थरों से टकरा कर भी बहना इबादत है,
समंदर तक पहुँचना ही नहीं, घुल जाना भी है।
-2 -
मैं किनारे पर खड़ा था अपनी प्यास लिए,
नदी चुपचाप मेरे भीतर उतरती रही,
अब मुझे बाहर पानी ढूँढना नहीं पड़ता।
-3 -
नदी ने अपना नाम कभी नहीं बताया,
हर गाँव उसे अलग पुकारता रहा,
वो बस बहती रही — बेनाम, बेनिशान।
-4 -
रात की ख़ामोशी में नदी ज़िक्र करती है,
हर लहर “हू” की सदा दोहराती है,
मैंने पानी में भी साँस लेनी सीख ली।
-5 -
नदी जब सूखी तो रेत मुस्कुराई,
कहा — फ़ना से ही बक़ा की राह निकलती है,
मैंने उजाड़ में भी बहाव महसूस किया।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,,
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