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Friday, 20 February 2026

नदी” पर कुछ सूफ़ियाना त्रिवेणियाँ



-1 -

नदी ने मुझसे कहा — ठहरना मत सीखो,

पत्थरों से टकरा कर भी बहना इबादत है,


समंदर तक पहुँचना ही नहीं, घुल जाना भी है।


-2  -

मैं किनारे पर खड़ा था अपनी प्यास लिए,

नदी चुपचाप मेरे भीतर उतरती रही,


अब मुझे बाहर पानी ढूँढना नहीं पड़ता।


-3   -

नदी ने अपना नाम कभी नहीं बताया,

हर गाँव उसे अलग पुकारता रहा,


वो बस बहती रही — बेनाम, बेनिशान।


-4   -

रात की ख़ामोशी में नदी ज़िक्र करती है,

हर लहर “हू” की सदा दोहराती है,


मैंने पानी में भी साँस लेनी सीख ली।


-5    -

नदी जब सूखी तो रेत मुस्कुराई,

कहा — फ़ना से ही बक़ा की राह निकलती है,


मैंने उजाड़ में भी बहाव महसूस किया।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,,

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