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Tuesday, 17 February 2026

तुम, मैं और देह में ठहरती ऋतु

तुम आईं
और मौसम ने
कैलेंडर देखना छोड़ दिया।
कोई तारीख़ नहीं बदली,
पर देह के भीतर
कुछ खुलने लगा
जैसे बंद कमरे में
खिड़की अपने-आप
थोड़ी-सी खिसक जाए।
तुम्हारे बैठने से
कुर्सी नहीं,
मेरी साँसें सम्हलीं।
तुम्हारे हाथ
हवा में थे,
पर असर
सीधे त्वचा पर पड़ा।
मैंने देखा
तुम्हारी आँखों में
वसंत था,
वह वसंत
जो फूल नहीं माँगता,
सिर्फ़ जगह चाहता है
ठहरने के लिए।
मेरे भीतर
अब भी
कुछ पिछली ऋतुएँ थीं
थोड़ी ठंड,
थोड़ी थकान,
कुछ अधूरे दिन।
तुम्हारी उपस्थिति ने
उन्हें हटाया नहीं,
बस
उनके बीच
एक संतुलन रख दिया।
हम बोले नहीं,
पर देह
संवाद में थी
कंधों की दूरी,
घुटनों का कोण,
साँसों की गति,
सब कुछ
एक मौन भाषा में।
मैं समझ गया—
ऋतु बाहर नहीं बदलती,
वह भीतर
किसी के आने से
ठहरती है।
तुम्हारी हँसी
धूप जैसी नहीं थी,
वह
बादलों के बीच से
झाँकती रोशनी थी
न पूरी,
न कम,
बस पर्याप्त।
मैंने सोचा था
वर्षा आएगी
तो सब बह जाएगा,
पर यहाँ
नमी थी
जो जड़ों तक जाती है,
और वहीं रह जाती है।
हम दोनों
एक ही समय में
अलग-अलग मौसम थे
और यही
हमारी संगति थी।
जब तुम उठीं,
तो मौसम
तुरंत नहीं गया।
देह को
याद रहने में
समय लगता है।
अब भी कभी-कभी
अकारण
हवा बदलती है,
त्वचा चुप हो जाती है
और मैं जान जाता हूँ,
कहीं
तुम, मैं
और वह ठहरी हुई ऋतु
फिर से
मिल रहे हैं।
मुकेश्,,,

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