तो शायद
सबसे पहले
ख़ामोशी मिलेगी
वह ख़ामोशी
जो दो लोगों के बीच
इतनी देर से
पली-बढ़ी है
कि अब
अपना नाम चाहती है।
मैं हाथ बढ़ाऊँगा
या नहीं,
यह तय नहीं है।
हो सकता है
मैं सिर्फ़
तुम्हारी आँखों में
ठहर जाऊँ
जैसे कोई
पुराना शहर
नक़्शे के बिना
याद आ जाए।
कल जब तुमसे मिलूँगा,
तो मैं
तुमसे पहले
अपने आप से मिलूँगा
उस व्यक्ति से
जो तुम्हारे होने से
थोड़ा कम डरता है,
और तुम्हारे चले जाने से
थोड़ा ज़्यादा।
तुम
शायद वही कपड़े पहनोगी,
या शायद नहीं—
पर तुम्हारी चाल में
वही विराम होगा
जहाँ मैं
हर बार
कुछ कहने से
चूक जाता हूँ।
मैं देखूँगा
तुम्हारे कंधों पर
दिन की थकान,
और सोचूँगा
काश
मैं इसे
कहीं रख पाता।
कल
समय भी
हमारे साथ
धीरे चलेगा।
घड़ी की सुइयाँ
हमें नहीं,
हम
उन्हें देख रहे होंगे।
अगर बारिश हुई
तो बात आसान होगी
कुछ शब्द
अपने-आप
भीग जाएँगे।
अगर धूप हुई
तो हम
छाया की तलाश में
और पास आ जाएँगे।
मैं तुम्हें बताऊँगा नहीं
कि कितनी बार
तुम
मेरे निर्णयों में
दख़ल देती रही हो
तुम्हारे बिना जाने।
तुम शायद
हँस दोगी,
और वह हँसी
मुझे
एक पल के लिए
निर्दोष बना देगी।
कल जब तुमसे मिलूँगा,
तो मैं
प्रेम को
घटना नहीं बनाऊँगा
उसे
स्थिति रहने दूँगा।
अगर मिलना
कम पड़ गया,
तो भी
ठीक रहेगा।
कुछ मुलाक़ातें
पूरी इसलिए नहीं होतीं
ताकि वे
अंदर तक
चलती रहें।
और जब
हम अलग होंगे,
तो मैं
पीछे मुड़कर
नहीं देखूँगा
क्योंकि
कुछ चेहरे
सीधे देखे जाएँ
तो ही
याद रह पाते हैं।
कल जब तुमसे मिलूँगा,
तो शायद
कुछ नहीं बदलेगा
और यही
सबसे बड़ा
बदलाव होगा।
मुकेश्,,,
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