मैंने तुझे
वाक्य के बीच नहीं रखा,
मैंने तुझे
कोष्ठक में रखा—
(तू)
ताकि
तू अर्थ भी रहे
और बाध्यता भी न बने।
तू
मेरे जीवन का
मुख्य वाक्य नहीं था,
पर
तेरे बिना
हर वाक्य
अधूरा लगता था।
कोष्ठक
कमज़ोरी नहीं होते,
वे बताते हैं
कि कुछ बातें
कहे बिना भी
मौजूद रहती हैं।
मैंने तुझे
सबके सामने
उच्चारित नहीं किया,
मैंने
तुझे
अपने भीतर
धीमे से
लिखा—
जैसे
कोई डर
प्रार्थना बन जाए।
(तू)
मतलब
वह प्रेम
जिसे
स्पष्ट नहीं किया जा सकता,
क्योंकि
स्पष्टता
कभी-कभी
इश्क़ को
घायल कर देती है।
लोग पूछते थे
“वह कौन है?”
मैं मुस्कराता—
कोष्ठक
सबको नहीं
दिखाए जाते।
तू
मेरे फैसलों में
शामिल नहीं था,
पर
मेरे ठहराव में
हमेशा मौजूद था।
मैं चलता रहा,
रिश्ते बदले,
नाम बदले,
शहर बदले
पर
(तू)
जैसा था
वैसा ही
मेरे भीतर
बना रहा।
कोष्ठक में रखा प्रेम
शोर नहीं करता,
वह
दावा नहीं करता,
वह
सिर्फ़
संभालकर
रखा जाता है।
कभी-कभी
मैंने चाहा
कि कोष्ठक हटा दूँ,
तुझे
सीधे लिख दूँ
पर डर गया,
कहीं
तू
पूर्णविराम न बन जाए।
इसलिए
मैंने
तुझे
अधूरा ही रहने दिया
क्योंकि
अधूरापन
ही
तेरी सुरक्षा थी।
अब
जब मैं
अपने जीवन को
पढ़ता हूँ,
तो
हर पन्ने पर
कुछ शब्द हैं
जो
छूटे हुए लगते हैं
मैं जानता हूँ,
वही
(तू) है।
कोष्ठक में रखा हुआ,
पर
मेरे पूरे होने का
सबसे सच्चा
सबूत।
और शायद
इसीलिए
मैंने प्रेम को
बाहर नहीं,
भीतर
लिखना चुना
ताकि
वह
मेरा हो,
पर
किसी का
क़ैद न बने।
मुकेश्,,,
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