रात के दरवेश
काले चोग़े में नहीं,
सितारों की चादर ओढ़े आते हैं
धीमे,
बिना पाँवों की आहट के।
वे शहर की बुझी हुई गलियों में
ज़िक्र करते हैं ख़ामोशी का,
और चाँद को
एक जलता हुआ तस्बीह बना लेते हैं।
उसी वक़्त
एक भटकी रूह
अपने ही सवालों की धुंध में
रास्ता टटोलती है।
न घर पहचान में आता है,
न मंज़िल।
रूह पूछती है,
“क्या कोई नक़्शा है
जिस पर मेरा नाम लिखा हो?”
दरवेश मुस्कुराते हैं,
उनकी मुस्कान में
पुरानी इबादतों की रोशनी है।
वे कहते नहीं,
बस हाथ उठाकर
आसमान की तरफ़ इशारा करते हैं,
जहाँ हर तारा
एक अधूरी दुआ की तरह चमक रहा है।
रात के दरवेश
सिखाते हैं—
भटकन भी एक सफ़र है,
और सफ़र भी एक सजदा।
रूह को रास्ता नहीं,
यक़ीन चाहिए।
धीरे-धीरे
भटकी रूह
अपने ही सीने की धड़कन सुनती है,
वहीं एक किब्ला छुपा था,
वहीं एक रौशनी।
सुबह होने तक
दरवेश ओझल हो जाते हैं,
पर रूह
अब भटकी नहीं रहती
क्योंकि उसने जान लिया,
कि रात अँधेरा नहीं,
एक दरवेश है
जो हर खोई हुई रूह को
उसके भीतर की सुबह तक ले जाता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,
No comments:
Post a Comment