उसकी बच्चों सी ज़िद
एक बार मैं भी सिगरेट पी कर देखूंगी..."
उस शाम
वो बारिश से भी ज़्यादा हलकी लग रही थी,
और आँखों में अजीब सी चंचल ज़िद —
जैसे कोई बच्ची पहली बार
छत पर जाकर भीगना चाहती हो
बिना डर के।
"एक बार मैं भी सिगरेट पी कर देखूंगी,"
उसने कहा —
हँसी नहीं थी उसमें,
बस एक तड़पती हुई जिज्ञासा थी
मुझे समझने की,
या शायद —
मेरे दर्द का एक कश लेने की।
मैंने सिगरेट आगे बढ़ाई
कुछ कहे बिना,
जैसे वो भी अब
मेरी चुप्पियों की भाषा समझने लगी थी।
उसने काँपती उंगलियों से
सिगरेट थामी —
और कश लिया,
इतना हल्का कि
जैसे किसी सपने को छू रही हो।
एक खाँसी आई —
फिर हँसी —
फिर कुछ नहीं।/बस एक लंबा सन्नाटा
हम दोनों के बीच धुंए की तरह लहराता रहा।
उसकी आँखों में
कोई पछतावा नहीं था —
बस वो देख रही थी
कि इस धुंए में आखिर क्या छिपा है
जो मुझे उससे छीन लेता है
हर शाम।
शायद उस एक कश में
उसने मुझे थोड़ा और पढ़ लिया,
और मैं —
थोड़ा और धुंआ हो गया।
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