बाद के दिनों में खामोशी से मुझे, सिगरेट और धुंए को देखती
(बिना कुछ कहे)
बाद के दिनों में,
न उसने मना किया,
न मैं छिपाया।
बस खामोशी पसरी रहती थी कमरे में —
सिगरेट के धुंए की तरह
धीरे-धीरे, हर कोने में।
वो चुपचाप मुझे देखती रहती,
जैसे जानती हो/अब बात करना भी
एक थकी हुई कोशिश होगी।
मैं कश लेता,/वो देखती रहती —
धुंआ मेरी सांसों से निकलकर
उसकी पलकों में अटक जाता।
कभी उसकी आँखें जलती थीं
मेरी लत से,
अब बस नम हो जाती थीं/बिना वजह।
उस खामोशी में/जितना दर्द था,
उतना ही अपनापन भी।
जैसे वो कह रही हो —
"अब रोकूँ भी तो क्या फ़ायदा?"
या शायद —
"अब तू ही तो रह गया है,/जला ले खुद को जितना चाहे..."
मैं धुंए में खुद को खोता गया,
वो ख़ुद को।
और हम दोनों
एक बुझती सिगरेट की राख की तरह
धीरे-धीरे
बस देखते रह गए एक-दूसरे को...
बिना कुछ कहे।
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