होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Sunday, 22 February 2026

बाद के दिनों में खामोशी से मुझे, सिगरेट और धुंए को देखती

 बाद के दिनों में खामोशी से मुझे, सिगरेट और धुंए को देखती

(बिना कुछ कहे)

 

बाद के दिनों में,
उसने मना किया,
मैं छिपाया।
बस खामोशी पसरी रहती थी कमरे में
सिगरेट के धुंए की तरह
धीरे-धीरे, हर कोने में।

वो चुपचाप मुझे देखती रहती,
जैसे जानती हो/अब बात करना भी
एक थकी हुई कोशिश होगी।

मैं कश लेता,/वो देखती रहती
धुंआ मेरी सांसों से निकलकर
उसकी पलकों में अटक जाता।

कभी उसकी आँखें जलती थीं
मेरी लत से,
अब बस नम हो जाती थीं/बिना वजह।

उस खामोशी में/जितना दर्द था,
उतना ही अपनापन भी।
जैसे वो कह रही हो
"
अब रोकूँ भी तो क्या फ़ायदा?"
या शायद
"
अब तू ही तो रह गया है,/जला ले खुद को जितना चाहे..."

मैं धुंए में खुद को खोता गया,
वो ख़ुद को।
और हम दोनों
एक बुझती सिगरेट की राख की तरह
धीरे-धीरे
बस देखते रह गए एक-दूसरे को...
बिना कुछ कहे।

No comments:

Post a Comment