मैंने राख में उसका चेहरा ढूँढ़ा
उस रात
मैंने ऐशट्रे को नहीं झाड़ा
जैसे कुछ बचा रह गया हो,
बिल्कुल उसके जाने की तरह
जो गया भी नहीं,
और था भी नहीं।
सिगरेट के हर कश में
एक नाम घुलता रहा
कभी होंठों की गर्मी बनकर,
कभी धुएँ की तरह
मेरी आँखों में चुभता हुआ।
उसके जाने के बाद
मैंने चुपके से जली हुई सिगरेटों की राख को
उँगलियों से बिखेरा,
जैसे पुराने रिश्तों की दरारों में
उसके चेहरे की रेखाएँ ढूँढ़ रहा हूँ।
वो राख,
जो कभी हमारे चुंबनों की गवाही थी,
अब
मेरे तन्हा कमराे की कालिख बन चुकी थी।
मैं जानता हूँ,
चेहरे राख में नहीं मिलते,
पर मोहब्बत की एक बीमारी होती है
जिसमें आदमी हर जलती चीज़ में
अपने अतीत का धुँधलका खोजता है।
और उस रात
मैंने सच में
राख में उसका चेहरा देखा
धुँधला, टूटा, पर अब भी पूरा मेरे अंदर।
मुकेश ,,,,,,,,,
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