हर सुट्टे में वो थोड़ा और बुझती रही
हर सुट्टे में
वो थोड़ा और बुझती रही
जैसे हर बार
मैं उसके नाम की कोई नमी
अपनी साँसों से चुरा लाता रहा।
वो बैठती थी खिड़की के पास,
बालों में धूप को उलझाए,
हवा से बातें करती थी,
और मैं सिगरेट की गर्म राख में
उसकी उँगलियों के निशान ढूँढ़ता रहा।
शुरुआत में वो धुएँ के छल्लों को
हँसी की तरह उड़ा देती थी
बाद में वही छल्ले
हमारे रिश्ते की बेआवाज़ दीवार बन गए।
वो कहती थी
"तुम खुद को जला कर मुझे समेटते क्यों हो?"
मैं हँसता था,
क्योंकि उसका जाना
मुझे राख की तरह समझ में आने लगा था।
अब हर सुट्टे में
वो थोड़ा और बुझती रही
एक दिन जब आख़िरी कश लिया,
तो पाया कि वो अब बस
मेरे फेफड़ों की तलछट में रह गई है,
काली, घुली हुई,
जैसे अधूरी मोहब्बत की कोई आख़िरी क़सम।
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