वो हर कश के बाद और पास आती गई
कमरे में धुआँ था —
जैसे यादों ने साजिश की हो
फिर से लौट आने की।
मैंने पहली सिगरेट जलाई,
वो नहीं थी —
पर महसूस हो रही थी।
पहला कश —
उसकी हँसी की तरह हल्का,
जैसे किसी कॉफी शॉप की कुर्सी पर
अब भी बैठी हो वो,
बिलकुल उसी अंदाज़ में
बाल पीछे करते हुए।
दूसरा कश —
उसकी आँखों-सा गहरा,
जिसमें डूबना अब भी
नशा लगता है,
और शायद —
मुक्ति भी।
तीसरे कश तक
वो कुर्सी खिसका चुकी थी,
मेरे ठीक सामने —
"अब भी वही सिगरेट?"
उसकी आवाज़ धुएँ से बनी थी,
पर दिल तक जा पहुँची।
हर अगला कश
जैसे किसी पुराने चुंबन का धुँधला रिहर्सल,
वो अब पास आकर
मेरे गिलास में उँगली घुमा रही थी,
"जैसे तुम्हारा दिल घुमाया था",
उसने मुस्कुरा कर कहा।
मैंने सिगरेट बुझा दी —
पर वो नहीं बुझी।
उसकी परछाईं
मेरे होठों और दिल के बीच
ठहर गई थी।
और सच कहूँ —
हर कश के बाद
वो और पास आती गई,
इतनी पास कि अब
धुएँ और उसकी बाहों में
कोई फ़र्क़ नहीं बचा।
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