तेरा ख़याल ज़ेहन से जाता क्यूँ नहीं?
मैं कितनी ही बार
वक़्त की धूल से उसे ढाँप देता हूँ,
मगर वो फिर
किसी ताज़ा बारिश की तरह
उभर आता है।
मैंने सोचा
मशग़ूल रहूँगा,
लोगों में बैठूँगा,
हँसी के दरम्यान
तेरा नाम खो जाएगा।
मगर अजीब है
हर हँसी के पीछे
तेरी आवाज़ की परछाईं मिलती है,
हर शोर में
तेरी ख़ामोशी का अक्स।
मैंने किताबें खोलीं
लफ़्ज़ों में पनाह लेने की कोशिश की,
मगर हर सफ़हे के बीच
तेरी उँगलियों की गर्माहट थी।
मैंने शहर बदले,
रास्ते बदले,
मौसम बदले
मगर ज़ेहन की गलियों में
तेरा घर जस का तस रहा।
कभी सोचता हूँ—
शायद मोहब्बत
कोई ख़याल नहीं,
एक नक़्श है
जो रूह पर खुद जाता है।
उसे मिटाने की कोशिश
वैसी ही है
जैसे हवा से कहना
चलना छोड़ दे।
तेरा ख़याल
कभी इबादत बनकर आता है,
कभी इम्तिहान बनकर।
रात की तन्हाई में
जब सब आवाज़ें सो जाती हैं,
तेरा नाम
मेरे अंदर
धीमे-धीमे धड़कता है।
मैं खुद से पूछता हूँ—
क्या ये आदत है?
या अधूरी दुआ?
या वो सफ़र
जो पूरा हुए बग़ैर
रुक गया?
कभी तेरी हँसी
मेरे दिल के आँगन में
धूप-सी उतरती है,
कभी तेरी याद
बादल बनकर
आँखों तक आ जाती है।
तेरा ख़याल जाता क्यूँ नहीं—
शायद इसलिए
कि मैंने उसे
भेजा ही नहीं।
वो मेरी साँसों के साथ
उतर गया है रगों में,
मेरी तन्हाई के साथ
रहना सीख गया है।
और सच तो ये है
मैंने जितनी दफ़ा
उसे भुलाने की ठानी,
उतनी ही दफ़ा
वो और क़रीब हो गया।
शायद कुछ लोग
ज़िंदगी से नहीं जाते
वो वक़्त से परे
एक एहसास बन जाते हैं।
तेरा ख़याल
अब बोझ नहीं,
एक रौशनी है
जो मुझे मेरी ही गहराइयों तक ले जाती है।
तो जाने दे
अगर वो जाता नहीं,
तो रहने दे उसे।
क्योंकि कुछ ख़याल
भुलाए नहीं जाते
वो रूह की तह में
हमेशा के लिए
बस जाते हैं।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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