होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Saturday, 21 February 2026

ख़्वाबों के बिना रात

 ख़्वाबों के बिना रात

जैसे आसमान से उतरा हुआ

एक स्याह ख़ालीपन,

जिसमें न सितारों की रौनक,

न चाँद की दिलासा।


आज फिर

नींद मेरी चौखट तक आई,

मगर दामन झटक कर लौट गई

कहती थी,

“तुम्हारी पलकों पर

अब कोई तस्वीर नहीं बची।”


मैं देर तक

छत को देखता रहा—

जहाँ दरारों में अटकी हुई

पुरानी उम्मीदें

मकड़ी के जालों-सी

हिलती-डुलती रहीं।


ख़्वाबों के बिना रात

बहुत भारी होती है—

जैसे दिल पर रख दिया गया हो

किसी अनकहे जुमले का पत्थर।


हवा खिड़की से दाख़िल हुई,

मगर उसके हाथ खाली थे

वो कोई ख़ुशबू नहीं लाई,

न किसी की आहट,

न किसी की पुकार।


सिर्फ़ सन्नाटा था

जो मेरे तकिए पर सिर रखकर

मेरे साथ रोता रहा।


कभी-कभी

रात भी थक जाती है

उसे भी चाहिए

एक रोशन ख़्वाब

जो उसके माथे पर

चाँद की तरह चमक सके।


मगर आज की रात

बिलकुल उजड़ी हुई है

जैसे किसी वीरान मस्जिद में

बुझा हुआ चराग़,

जिसकी लौ

आख़िरी बार काँपी थी

और फिर सो गई।


मैंने आँखें बंद कीं

सोचा, शायद

तुम्हारी कोई याद

ख़्वाब बनकर उतर आए।


मगर यादें भी

आज अजनबी थीं—

उन्होंने दूर खड़े होकर

बस इतना कहा,

“हम हक़ीक़त हैं,

ख़्वाब नहीं।”


और मैं समझ गया

जब दिल बहुत भर जाता है,

तो ख़्वाब रास्ता भूल जाते हैं।


ख़्वाबों के बिना रात में

वक़्त की चाल सुस्त पड़ जाती है,

घड़ी की टिक-टिक

किसी मर्ज़ की तरह

सीने में उतरती रहती है।


दूर कहीं

एक कुत्ता भौंकता है,

कोई रेलगाड़ी गुज़रती है—

और हर आवाज़

मुझे याद दिलाती है

कि दुनिया चल रही है,

सिर्फ़ मेरी रात ठहरी हुई है।


मगर शायद

इसी ठहराव में

कोई गहरा राज़ छिपा है

कि जब ख़्वाब नहीं आते,

रूह जागती है।


वो अपने भीतर उतरकर

उन कोनों को टटोलती है

जहाँ टूटे हुए ख़्वाबों की

धूल जमा है।


शायद

कल की रात

फिर कोई नर्म रोशनी

मेरी पलकों पर ठहरे

कोई अधूरा लम्हा

पूरा होने की ज़िद करे।


मगर आज

ख़्वाबों के बिना यह रात

मुझे मेरे असली वजूद से

रूबरू कर रही है।


और मैं

इस स्याह ख़ालीपन में भी

एक छोटी-सी उम्मीद की लौ

छुपाकर रखे हुए हूँ


कि हर बे-ख़्वाब रात के बाद

सुबह ज़रूर होती है…

और कभी-कभी

सुबह ही

सबसे बड़ा ख़्वाब होती है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

No comments:

Post a Comment