गेंदा का एक छोटा-सा सूरज
आँगन की धूल में
गेंदा चुपचाप खिलता है
न किसी शान से,
न किसी अभिमान से।
उसकी गोल पंखुड़ियाँ
जैसे एक छोटा-सा सूरज हों,
जो अपनी सीमित रोशनी में भी
पूरा दिन भर देता है।
मंदिर की सीढ़ियों पर,
त्योहार की थाली में,
या किसी सूने दरवाज़े के पास
वह हर जगह
थोड़ी-सी चमक रख आता है।
गेंदा बताता है
रोशनी बड़ी नहीं होती,
बस सच्ची होती है।
आम ज़िंदगी की थकी दोपहर में
वह मुस्कुरा कर कहता है,
“छोटा होना भी पर्याप्त है,
यदि तुम किसी के दिन में
थोड़ी-सी धूप जोड़ सको।”
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
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