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Friday, 20 February 2026

तुम -


तुम्हारी याद का मौसम यूँ ठहरा है साँसों में

कि हर आती-जाती हवा तुम्हारा नाम लेती है,

अब खिड़कियाँ खोलना भी इबादत-सा लगता है।


तुम्हारी आवाज़ की परछाई बसी है कानों में

कि सन्नाटा भी तुम्हारा लहजा ओढ़ लेता है,


अब ख़ामोशी से मुझे कोई शिकायत नहीं।


तुम्हारी रौशनी उतरी है इस क़दर रूह में

कि अँधेरा भी सज्दा करता हुआ लगता है,


मैंने रात से डरना छोड़ दिया है।


तुम्हारे ख़्वाब की खुशबू है मेरे लम्हों में

कि हर दिन किसी जुमे की तरह पाक़ लगे,


अब कैलेंडर की तारीख़ें मायने नहीं रखतीं।


तुम्हारी आहट की धुन है दिल की धड़कन में

कि हर धड़कन एक क़व्वाली-सी उठती है,


मैंने साज़ों के बिना गाना सीख लिया है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,

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