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Saturday, 21 February 2026

भीड़ से परे एक रिश्ता

 भीड़ से परे एक रिश्ता

न कोई ऐलान,

न कोई इज़हार का शोर।


बस दो रूहों के दरमियान

एक महीन-सी डोर,

जिसे किसी ने देखा नहीं,

पर जिसे तोड़ना

किसी के बस में भी नहीं।


दुनिया अपने हिसाब से

रिश्तों के नाम रखती रही

दोस्ती, चाहत, इश्क़,

या बस एक गुज़रता हुआ लम्हा।


मगर जो हमारे बीच है,

वो इन लफ़्ज़ों में क़ैद नहीं होता।


तुम अपनी महफ़िलों में रौशन,

मैं अपनी ख़ामोशियों में मग्न

मगर एक अनकहा एहसास

हमारे बीच

रात की हवा-सा बहता रहता है।


जब तुम हँसते हो,

कहीं दूर बैठा मैं भी

बिना वजह मुस्कुरा उठता हूँ।


जब मेरे दिल पर

कोई उदासी उतरती है,

शायद तुम्हें भी

एक अजनबी-सी थकान घेर लेती होगी।


भीड़ से परे यह रिश्ता

न छूने की ज़िद करता है,

न पाने की—

बस होने की इजाज़त माँगता है।


जैसे कोई दरिया

दो किनारों को छुए बग़ैर

उनके साथ बहता रहे।


कभी सोचा है

कुछ लोग ज़िंदगी में

आते नहीं, उतरते हैं।

बिना दस्तक,

बिना आवाज़।


और फिर

हमारे अंदर

एक जगह बना लेते हैं,

जहाँ और कोई नहीं पहुँचता।


तुम्हारा नाम

मेरे लिए शोर नहीं,

एक सुकून है।


मैं तुम्हें पुकारता नहीं,

बस महसूस करता हूँ

जैसे साँस को

हर वक़्त नाम देने की ज़रूरत नहीं होती।


यह रिश्ता

न दुनिया से लड़ता है,

न दुनिया को साबित करता है।


यह बस

रात की तन्हाई में

एक उजाला रख देता है,

और दिन की भीड़ में

एक भरोसा।


अगर कभी

रास्ते अलग भी हो जाएँ,

तो भी यक़ीन है—

यह डोर

समय की उँगलियों से नहीं टूटेगी।


क्योंकि भीड़ से परे जो रिश्ता होता है,

वो नामों से नहीं,

नसीब से लिखा जाता है।


और ऐसे रिश्ते

कभी आवाज़ नहीं करते

बस रूह में

धीमे-धीमे

धड़कते रहते हैं।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

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