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Saturday, 21 February 2026

वो और मैं — दरमियान का रास्ता

 वो और मैं — दरमियान का रास्ता


उसने पूछा—

बाल यूँ बिखरे क्यों रखते हो?

कंघी से बैर है क्या?


मैंने कहा—

सलीक़ा सीखा नहीं कभी,

हवाओं से दोस्ती है बस।


हँसकर बोली—

जो हो, वही बताओ,

जो नहीं हो

वो मैं तुमसे बेहतर जानती हूँ।


मैंने देखा—

उसकी आँखों में

एक हल्की-सी शरारत थी,

और एक गहरी-सी पहचान भी।


वो अक्सर कहती—

घड़ी क्यों नहीं पहनते?

वक़्त से भागते हो क्या?


मैंने कहा—

वक़्त को कलाई पर बाँधना

मुझे गवारा नहीं।

मैं उसे खुला छोड़ देता हूँ,

कि जब चाहे मुझे पकड़ ले।


वो मुस्कुराई—

तुम्हें पकड़ना आसान नहीं,

वक़्त से भी ज़्यादा फिसलते हो।


कभी बोली—

इतना चुप क्यों रहते हो?

लोगों से मिलते क्यों नहीं?


मैंने कहा—

हर आवाज़ को

लफ़्ज़ होना ज़रूरी नहीं,

कुछ एहसास

ख़ामोशी में बेहतर लगते हैं।


वो बोली—

तो फिर मुझे क्यों सुन लेते हो

बिना बोले?


मैंने कहा—

शायद तुम्हारी आवाज़

मेरी ख़ामोशी की ज़बान जानती है।


एक दिन चलते-चलते

उसने मेरी कलाई पकड़ ली—

और बोली,

डरते हो क्या साथ चलने से?


मैंने कहा—

डर नहीं,

आदत नहीं है किसी का

यूँ बराबर चलना।


उसने क़दम मिला दिए—

और कहा,

आदत डाल लो,

हर रास्ता अकेले तय नहीं होता।


फिर उसने पूछा—

तुम हमेशा आसमान क्यों देखते रहते हो?


मैंने कहा—

ज़मीन बहुत क़रीब होती है,

आसमान थोड़ा फ़ासला देता है।


वो बोली—

और मैं?

मैं किस तरफ़ हूँ?


मैंने कहा—

तुम वो फ़ासला हो

जो ज़मीन और आसमान के बीच

साँस लेता है।


कुछ देर हम चुप रहे।

हमारे बीच

एक हल्की-सी हवा थी,

जो शायद हमारी बातों से

ज़्यादा समझदार थी।


फिर अचानक उसने पूछा—

अगर मैं चली जाऊँ

तो क्या बदल जाएगा?


मैंने मुस्कुराकर कहा—

रास्ते तो वही रहेंगे,

मगर उनका मतलब बदल जाएगा।


वो बोली—

तुम्हें यक़ीन है

हमेशा ऐसे ही बात कर पाओगे?


मैंने कहा—

बातें बदलती हैं,

लोग बदलते हैं,

मगर कुछ लम्हे

अपनी जगह से नहीं हिलते।


वो हँसी—

तुम हर जवाब में

थोड़ा-सा बच निकलते हो।


मैंने कहा—

और तुम हर सवाल में

थोड़ा-सा ठहर जाती हो।


फिर चलते-चलते

उसने धीरे से कहा—

देखो, गिरना मत।


मैंने पूछा—

तुम थाम लोगी?


उसने बिना देखे

मेरा हाथ पकड़ लिया—

और बोली,

कोशिश तो पूरी करूँगी।


हमारे बीच

उस दिन कोई वादा नहीं हुआ,

न इज़हार,

न इंकार।


बस एक रास्ता था—

जो हमारी हँसी के नीचे

धीमे-धीमे मुस्कुरा रहा था।


और शायद

उसे मालूम था—

कुछ रिश्ते

सवालों से नहीं,

साथ चलने से बनते हैं।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

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