उस दिन
हमने समय को
घड़ी से उतारकर
मिट्टी में रख दिया था,
जामुन के नीचे
जहाँ छाया
अपने ही वज़न से
हल्की हो जाती है।
उस दिन
प्रेम कोई वाक्य नहीं था,
बीज था
जिसे हथेली में नहीं,
चुप्पी में बोया गया।
तुम चली थीं
मेरे साथ नहीं,
मेरे भीतर
और रास्ता
खुद को
खोजने लगा था।
उस दिन
यात्रा आगे की नहीं थी,
गहराई की थी,
जहाँ कदम नहीं,
स्मृतियाँ चलती हैं।
तुम्हें ख़ाली होना था
अपने भीतर से
उन शब्दों का बोझ उतारकर
जो बरसों से
सच होने का
अभ्यास कर रहे थे।
मैंने कुछ पूछा नहीं,
क्योंकि प्रश्न
उस दिन भाषा नहीं थे,
वे आँखों की
नमी में
घुल चुके थे।
तुम बोलीं
या शायद नहीं भी,
पर मैंने सुना
हर वह बात
जो कभी
कही नहीं जा सकी।
उस सुनने में
मेरी देह
धीरे-धीरे
छाल में बदलती गई,
और मैं
एक पेड़ हो गया।
जड़ें
धरती से नहीं,
तुम्हारी चुप्पी से
उग आईं,
पत्ते
हवा से नहीं,
तुम्हारी साँसों से
हिलने लगे।
अब मैं खड़ा हूँ
दूर,
सुनसान,
अकेलेपन की
खुली जगह में,
जहाँ राहगीर नहीं आते,
सिर्फ़ मौसम
मिलने आते हैं।
कभी तुम लौटो
तो पहचान लेना
यह जो छाया
अचानक ठहर जाती है,
यह जो हवा
नाम लेकर
नहीं पुकारती,
वही मैं हूँ।
जामुन के नीचे
अब भी
प्रेम पक रहा है,
फल की तरह
मीठा नहीं,
सच्चा।
और उस दिन की तरह
आज भी
मैं प्रतीक्षा नहीं करता,
सिर्फ़ खड़ा रहता हूँ
एक पेड़,
जिसने
तुम्हें
सुना था।
मुकेश ,,,,,,,,
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