एक उम्र होती है
जब हम पेड़ों को
सिर्फ़ देखते हैं—
उनकी ऊँचाई नापते हैं,
छाया का हिसाब रखते हैं,
फल की प्रतीक्षा करते हैं।
और एक उम्र आती है
जब हम
उन्हें सुनना शुरू करते हैं।
यह वही उम्र है
जब भीतर का शोर
थोड़ा कम हो जाता है,
जब महत्वाकांक्षाएँ
धीमे चलना सीख लेती हैं,
और उपलब्धियाँ
इतनी ज़रूरी नहीं लगतीं।
पेड़ बोलते नहीं,
वे हवा के साथ
संकेत करते हैं—
पत्तियों की हल्की रगड़ में
कोई पुराना राग छिपा होता है।
जो जल्दी में है
उसे सिर्फ़ सरसराहट सुनाई देती है,
जो ठहरा है
उसे कथा।
पेड़ों को सुनने की उम्र
बचपन भी हो सकती है—
जब हम बिना कारण
तने से लिपट जाते हैं।
और वह परिपक्वता भी
जब हम
किसी पुराने बरगद के नीचे
बैठकर
अपनी अधूरी बात
धरती से कह आते हैं।
पेड़ बताते हैं
कि जड़ें
दिखती नहीं,
पर वही संभालती हैं।
वे सिखाते हैं
कि हर पतझड़
अंत नहीं,
एक अभ्यास है
छोड़ देने का।
और हर बसंत
प्रदर्शन नहीं,
भीतर की तैयारी का
परिणाम है।
पेड़ों को सुनने की उम्र
दरअसल
खुद को सुनने की उम्र है।
जब हम समझ लेते हैं
कि बढ़ना
ऊपर की ओर ही नहीं,
अंदर की ओर भी होता है।
जब हम जान लेते हैं
कि स्थिर खड़े रहकर भी
आकाश को छुआ जा सकता है।
तब
किसी शाम
हवा हल्की-सी चलती है
और हम अचानक
समझ जाते हैं
पेड़ हमेशा से बोल रहे थे,
बस
हमारी उम्र
अभी तैयार नहीं थी।
मुकेश ,,,,,,,,,
No comments:
Post a Comment