आदिम स्त्री ऊर्जा : एक काव्यात्मक चिंतन
आरंभ में
जब शब्द नहीं थे,
केवल स्पंदन था
वहीं कहीं
स्त्री ऊर्जा पहली बार धड़की थी।
वह देह नहीं थी,
वह दिशा थी।
वह आकार नहीं,
अंतरिक्ष में फैलती हुई
एक अदृश्य लय थी।
धरती की कोख में
जो बीज को अंकुर बनाती है,
नदी के भीतर
जो जल को गान बनाती है,
वही आदिम स्त्री ऊर्जा है
निर्माण की,
पोषण की,
और रूपांतरण की शक्ति।
उसे किसी नाम में बाँधा नहीं जा सकता;
कभी वह उषा है,
कभी रात्रि की गहराई,
कभी चाँद की नमी,
कभी अग्नि की प्रखरता।
वह आकर्षण भी है,
आश्रय भी।
वह काम भी है,
करुणा भी।
जब वह मुस्कुराती है,
तो समय थोड़ा ठहर जाता है;
जब वह मौन होती है,
तो ब्रह्मांड अपने भीतर
कुछ नया रचता है।
आदिम स्त्री ऊर्जा
सिर्फ़ जन्म देने की शक्ति नहीं
वह अर्थ देने की क्षमता है।
वह रिक्तता को
अर्थपूर्ण बना देती है।
पुरुष उसमें
केवल प्रेम नहीं खोजता,
अपना विस्तार खोजता है।
और स्त्री
जब अपनी इस ऊर्जा को पहचान लेती है,
तो वह किसी की प्रतीक्षा नहीं करती;
वह स्वयं
स्रोत बन जाती है।
यह ऊर्जा
न विनम्र है,
न उग्र
वह संतुलन है।
वह हमें याद दिलाती है
कि सृष्टि
किसी युद्ध से नहीं,
एक कोमल कंपन से जन्मी थी।
और वही कंपन
आज भी
हर स्त्री की आँखों की चमक में,
हर जन्म की पहली साँस में,
हर प्रेम की पहली स्वीकृति में
धीरे-धीरे धड़कता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,
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