लघु उपन्यास – दूसरा खंड
अध्याय – 03 : जब मौन बोलने लगा
कमरा आज भी वैसा ही था।
बर्तन
अब भी प्लेटफॉर्म पर पड़े थे।
झाड़ू
तख़्त के नीचे
अपनी लंबी नींद में थी।
सिगरेट की डिब्बी
मेज़ पर चुपचाप रखी थी।
और मैं
कुर्सी पर बैठा
धीरे-धीरे
एक अजीब-सी शांति में उतर रहा था।
कल रात
धुएँ में जो दृश्य उभरे थे
वे अब भी मन में तैर रहे थे।
Socrates
का प्रश्न
“स्वयं को जानो।”
Plato
का स्वप्न
एक न्यायपूर्ण राज्य।
फिर
Confucius
का अनुशासन
और
Laozi
का सहज बहाव।
मुझे अचानक लगा
दुनिया की सारी सभ्यताएँ
मानो
एक ही कमरे में
आकर बैठ गई हैं।
और मैं
उनके बीच
एक श्रोता भर हूँ।
तभी
माण्डूक्य उपनिषद की प्रति
जो सिरहाने रखी थी
हवा से थोड़ा-सा खुल गई।
पन्ने धीरे-धीरे हिले।
और अचानक
कमरे में
एक बिल्कुल अलग-सी शांति उतर आई।
यह शांति
किसी विचार की नहीं थी।
यह
मौन की शांति थी।
मुझे लगा
कमरे में कोई और भी है।
पर इस बार
कोई धुआँ नहीं उठा।
कोई आकृति नहीं बनी।
बस
एक उपस्थिति।
जैसे
किसी ने
कमरे के बीचोंबीच
अदृश्य दीप जला दिया हो।
मैंने आँखें बंद कर लीं।
और तभी
एक बहुत धीमी आवाज़
जैसे भीतर से आई
“ब्रह्म सत्य है।”
मैंने आँखें खोलीं।
मेरे सामने
एक संन्यासी खड़े थे।
गेरुए वस्त्र।
तेजस्वी आँखें।
अत्यंत शांत चेहरा।
मैंने उन्हें पहचान लिया।
वे थे
Adi Shankaracharya।
उनके हाथ में
कोई पुस्तक नहीं थी।
जैसे उन्हें
किसी पुस्तक की आवश्यकता ही न हो।
वे कुछ क्षण
कमरे को देखते रहे।
फिर धीरे से बोले
“तुम बहुत से विचार सुन चुके हो।”
उनकी आवाज़
बहुत शांत थी।
“यूनान ने तुम्हें तर्क दिया।
चीन ने तुम्हें संतुलन दिया।”
उन्होंने
माण्डूक्य उपनिषद की ओर देखा।
फिर बोले
“पर सत्य
विचारों से नहीं मिलता।”
कमरा
और भी शांत हो गया।
मैं
उनकी ओर देखता रहा।
उन्होंने कहा
“जिसे तुम खोज रहे हो
वह तुम्हारे भीतर ही है।”
फिर उन्होंने
धीरे से
उपनिषद की ओर इशारा किया।
“जाग्रत।
स्वप्न।
सुषुप्ति।”
वे कुछ क्षण रुके।
फिर बोले
“और चौथा—
तुरीय।”
कमरे में
जैसे एक गहरी तरंग फैल गई।
पंखा
अब भी बंद था।
हवा
अब भी स्थिर थी।
पर भीतर
कुछ चल रहा था।
शंकराचार्य ने
मुस्कुराकर कहा
“जब मन शांत हो जाता है
तो वही कमरा
आश्रम बन जाता है।”
उन्होंने एक बार
पूरे कमरे को देखा।
बर्तन।
झाड़ू।
किताबें।
फिर मेरी ओर देखकर बोले
“और वही मनुष्य
जो खोज रहा था
उसे पता चलता है
खोजने वाला
और खोजी जाने वाली चीज़
दोनों एक ही हैं।”
इतना कहकर
उन्होंने आँखें बंद कर लीं।
और कुछ ही क्षणों में
उनकी आकृति
धीरे-धीरे
मंद प्रकाश में विलीन होने लगी।
कमरा फिर
वैसा ही हो गया।
पर अब
उसकी खामोशी
पहले जैसी नहीं थी।
उसमें
एक गहरा
अदृश्य
मौन बस गया था।
मैं कुर्सी पर बैठा
बहुत देर तक सोचता रहा
शायद
दुनिया के सारे दर्शन
आख़िरकार
यहीं आकर मिलते हैं
मौन में।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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