लघु उपन्यास
भाग – 4 : कमरा (दूसरी रात)
दरवाज़ा खोलते ही
कमरा मुझे देखता है।
मैं भी उसे देखता हूँ।
कुछ क्षणों तक
हम दोनों
एक-दूसरे को पहचानने की कोशिश करते हैं
जैसे कोई पुराना रिश्ता
कई दिनों बाद
फिर से आमने-सामने आया हो।
मैं चप्पल उतारकर
अंदर आ जाता हूँ।
ऐश-ट्रे
वैसी ही भरी हुई है।
उसमें पड़े ठुठके
जैसे रात भर
एक-दूसरे से बातें करते रहे हों।
मैं एक नया ठुठका
उनके बीच छोड़ देता हूँ।
वे
मुझे चुपचाप स्वीकार कर लेते हैं।
तख़्त के नीचे पड़ी
झाड़ू
अब भी वहीं है।
पर आज
वह मुझे थोड़ी ज़्यादा ध्यान से देख रही है।
जैसे कह रही हो
“तुम बाहर से
हर रोज़ नई सिगरेट ले आते हो,
पर मेरे लिए
एक दिन भी नहीं निकालते।”
मैं मुस्कुरा देता हूँ।
सिंक की तरफ़ जाता हूँ।
चाय का मग
अब भी
आख़िरी घूँट की स्मृति में डूबा हुआ है।
जूठी प्लेट
अपने बर्तनों के बीच
थोड़ी और चुप हो गई है।
और वह चम्मच
जिस पर हलवे की चाशनी थी
अब सूख चुकी है।
पर जैसे ही मैं उसे देखता हूँ
मुझे वह शाम याद आ जाती है।
तुम
रसोई में खड़ी थीं।
घर में
सिर्फ़ दो चुटकी आटा
और थोड़ी-सी शक्कर थी।
फिर भी
तुमने हलवा बनाया।
इतने ध्यान से
जैसे वह
किसी बड़े पर्व का प्रसाद हो।
मैंने कहा भी था
“हलवा मुझे ज़्यादा पसंद नहीं।”
तुमने हँसकर जवाब दिया था—
“आज से हो जाएगा।”
कमरे की हवा
थोड़ी देर के लिए
उस हँसी से भर जाती है।
मैं खिड़की खोल देता हूँ।
बाहर से
रात की हवा अंदर आती है।
कोने में
मकड़ी अभी भी
अपने जाल पर काम कर रही है।
उसकी दुनिया
धीरे-धीरे बड़ी हो रही है।
वह मुझे देखकर
रुकती नहीं।
शायद
उसे पता है
सृजन करने वालों को
दर्शकों की ज़रूरत नहीं होती।
दरवाज़े के पास
एक जूता पड़ा है।
उसका साथी
अब भी तख़्त के नीचे है।
दोनों
आज भी नहीं मिले।
मैं सोचता हूँ
कितनी चीज़ें
सिर्फ़ इसलिए अलग पड़ी रहती हैं
क्योंकि किसी ने
उन्हें मिलाने की कोशिश नहीं की।
मैं तख़्त पर बैठ जाता हूँ।
कमरे की चीज़ें
धीरे-धीरे
अपनी-अपनी जगह शांत हो जाती हैं।
जैसे वे
मेरे लौट आने से
संतुष्ट हों।
मैं सिगरेट जलाता हूँ।
धुआँ
धीरे-धीरे ऊपर उठता है।
छत की तरफ़।
छत
उसे चुपचाप अपने पास रख लेती है।
कुछ देर बाद
मुझे महसूस होता है—
यह कमरा
सिर्फ़ ईंट और दीवारों का नहीं है।
यह
मेरी यादों का घर है।
यहाँ हर वस्तु
किसी कहानी की रखवाली कर रही है।
और शायद
मैं अकेला नहीं हूँ।
मेरे साथ
यह सब भी रहते हैं
ऐश-ट्रे,
झाड़ू,
चम्मच,
मकड़ी,
जूते,
और वह हलवा
जिसका स्वाद
अब भी
मेरी ज़ुबान के किसी कोने में
धीरे-धीरे बचा हुआ है।
मैं लेट जाता हूँ।
कमरे की लाइट बंद कर देता हूँ।
अंधेरे में
कमरा धीरे-धीरे
मुझे अपने भीतर समेट लेता है।
और मुझे लगता है
कहानी अभी खत्म नहीं हुई।
शायद
कल रात
यह कमरा
मुझसे
कुछ और कहेगा।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
No comments:
Post a Comment