लघु उपन्यास
भाग – 5 : किराया, हलवे की स्मृति और मकान-मालिक
इस कमरे में रहते हुए
कई साल हो गए हैं।
इतने साल
कि दीवारों ने
मेरी खामोशियों की भाषा सीख ली है।
अब वे
मेरे कदमों की आवाज़ से ही पहचान लेती हैं
कि मैं खुश हूँ
या सिर्फ़ ज़िंदा हूँ।
किराया
कई महीनों से नहीं दिया है।
पहले-पहले
मकान-मालिक हर हफ़्ते आता था।
दरवाज़े पर
थोड़ी ज़ोर से दस्तक देता था
जैसे
दस्तक नहीं
कर्ज़ की याद दिलाता हो।
मैं दरवाज़ा खोलता
तो वह अंदर झाँककर
कमरे को देखता था।
कमरे की हालत देखकर
उसका चेहरा
धीरे-धीरे बदल जाता था।
फिर वह पूछता - “कब दोगे?”
मैं कोई तारीख़ नहीं देता था।
बस कहता—
“जल्दी।”
धीरे-धीरे
उसे समझ आ गया
कि मेरे “जल्दी” का
समय से
कोई संबंध नहीं है।
अब वह
कम ही बोलता है।
कभी-कभी
बस यूँ ही चला आता है।
दरवाज़े पर खड़ा रहता है
जैसे कोई पुराना परिचित
हाल पूछने आया हो।
फिर मेरी तरफ़ देखता है
और पूछता है
“सिगरेट है?”
मैं डिब्बी आगे कर देता हूँ।
वह एक सिगरेट निकालता है
धीरे-धीरे सुलगाता है।
हम दोनों
कुछ देर
खामोशी में धुआँ उड़ाते रहते हैं।
किराये की बात
अब हमारे बीच
बहुत कम होती है।
कभी-कभी
वह आधी मुस्कान के साथ कह देता है—
“जब हो जाए
दे देना।”
और फिर
सीढ़ियाँ उतर जाता है।
मुझे लगता है
अब उसे भी पता है
कि इस कमरे में
सिर्फ़ एक किरायेदार नहीं रहता।
यहाँ
कई सालों की थकान रहती है।
कुछ अधूरी कविताएँ रहती हैं।
और
हलवे की एक पुरानी शाम रहती है।
सिंक में पड़ा चम्मच
आज भी
उस शाम की गवाही देता है।
तुमने हलवा बनाते समय
कहा था
“इतनी गरीबी में भी
मीठा बनाया जा सकता है।”
मैंने मज़ाक में कहा था—
“गरीबी में तो
मीठा ही बनाना पड़ता है।”
तुम हँस पड़ी थीं।
वह हँसी
आज भी
इस कमरे की दीवारों में
कहीं अटकी हुई है।
कभी-कभी
रात बहुत शांत होती है
तो लगता है
दीवारें उसे
धीरे-धीरे दोहरा रही हैं।
मैं तख़्त पर बैठा
यह सब सोचता हूँ।
ऐश-ट्रे
फिर भरने लगी है।
मकड़ी का जाला
अब पहले से बड़ा हो गया है।
जूते
अब भी
अलग-अलग पड़े हैं।
और मैं
अब भी
यही सोच रहा हूँ
कि शायद
इस कमरे का किराया
पैसों से नहीं,
यादों से
चुकाया जा रहा है।
मुकेश ,,,,,,,,
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