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Tuesday, 3 March 2026

कंधों की ढलान पर टिकता चाँद

 कंधों की ढलान पर टिकता चाँद


जब तुम बाल समेटकर

हल्का-सा सिर मोड़ती हो,

तुम्हारे कंधों की ढलान पर

कोई चाँद आकर ठहर जाता है।


वो चाँद आसमान वाला नहीं,

एक नर्म उजाला है—

जो त्वचा की खामोश सतह पर

धीरे-धीरे फिसलता है।


तुम्हारी गर्दन से उतरती रोशनी

कंधों की उस नरम वक्रता पर

जैसे रात ने अपना तकिया रख दिया हो।


मैं दूर खड़ा देखता हूँ,

और सोचता हूँ

इतनी सादगी में

इतनी रौशनी कैसे बसती है?


तुम चलती हो तो

वो चाँद भी साथ चलता है,

हर कदम पर

अपनी परछाईं बदलता हुआ।


कंधों की ढलान पर टिकता वह उजाला

कोई दृश्य नहीं,

एक एहसास है—

जहाँ नज़र ठहर जाए

और दिल को

अपना घर मिल जाए।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,


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