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Monday, 16 March 2026

स्मृतियों की धुंध में चलता हुआ आदमी

 स्मृतियों की धुंध में चलता हुआ आदमी


एक आदमी

स्मृतियों की धुंध में चलता हुआ दिखाई देता है

धीरे-धीरे,

जैसे किसी पुराने शहर की

भूली हुई गली में

अपने ही क़दमों की आहट सुनता हुआ।


उसके पास

कोई नक्शा नहीं है,

सिर्फ़ कुछ चेहरे हैं

जो समय की किताब में

धुंधले पड़ते जा रहे हैं।


वह कभी रुककर

पीछे मुड़कर देखता है,

तो लगता है

जैसे रास्ते ने भी

अपनी यादें खो दी हों।


कुछ आवाज़ें

अब भी हवा में तैरती हैं

किसी हँसी की हल्की गूँज,

किसी नाम की धीमी पुकार,

किसी अधूरे वाक्य की

थकी हुई परछाईं।


वह आदमी जानता है

कि स्मृतियाँ

कभी पूरी तरह लौटकर नहीं आतीं,

वे बस

धुंध की तरह

कुछ देर साथ चलती हैं।


फिर अचानक

किसी मोड़ पर

एक पुराना चेहरा उभरता है,

और दिल को लगता है

कि समय ने

अभी-अभी

एक बंद दरवाज़ा खोल दिया हो।


पर यह दरवाज़ा भी

ज़्यादा देर खुला नहीं रहता

यादें फिर से

धीरे-धीरे धुंध में बदल जाती हैं।


और वह आदमी

फिर चल पड़ता है

उसी रास्ते पर,

जहाँ हर क़दम

बीते हुए दिनों की

हल्की सी आहट लिए होता है।


शायद

ज़िन्दगी का सच भी यही है

हम सब

किसी न किसी दिन

स्मृतियों की धुंध में चलते हुए

एक ऐसे घर की तलाश करते हैं

जो कभी था

और शायद अब भी

कहीं भीतर मौजूद है।


मुकेश ,,,,,,,,

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