ख़ामोशी का व्याकरण
कभी-कभी
ज़िन्दगी शब्दों से नहीं
ख़ामोशी से लिखी जाती है।
जैसे कोई पुराना लेखक
स्याही की जगह
समय का इस्तेमाल करता हो।
तुम्हारा चेहरा
उस भाषा की किताब है
जिसका व्याकरण
सिर्फ़ दिल समझता है।
आँखें
उसके सबसे पुराने अक्षर हैं,
जहाँ हर नज़र
एक वाक्य बन जाती है।
मुस्कान
कभी अल्पविराम की तरह ठहरती है,
और उदासी
एक लंबे प्रश्नचिह्न की तरह
आसमान में टंगी रहती है।
कितनी अजीब बात है
लोग शब्दों से बातें करते हैं,
और आत्माएँ
ख़ामोशी से।
मैं जब तुम्हें देखता हूँ
तो लगता है
जैसे कोई अनकही भाषा
धीरे-धीरे मेरे भीतर उतर रही हो।
और तब समझ आता है
कि दुनिया की सबसे सच्ची कविता
किसी किताब में नहीं,
बल्कि
दो चेहरों के बीच फैली हुई
एक गहरी ख़ामोशी में लिखी जाती है।
मुकेश ,,,,,,
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