मैं तुम्हारे उदास चेहरे की तहरीर पढ़ लेता हूँ
मैं तुम्हारे उदास चेहरे की तहरीर पढ़ लेता हूँ,
बिना किसी लफ़्ज़ के भी
तुम्हारी ख़ामोशी का मतलब समझ लेता हूँ।
तुम कुछ कहो या न कहो,
तुम्हारी आँखों के किनारों पर
जो ठहरी हुई नमी है
वही तो असल दास्तान है।
कभी लगता है
जैसे शाम ने अपने रंग
तुम्हारी पलकों पर रख दिए हों,
और दिन की थकी हुई रोशनी
तुम्हारे चेहरे पर आकर सो गई हो।
तुम्हारी मुस्कान भी
कभी-कभी अधूरी सी लगती है,
जैसे किसी किताब का वह पन्ना
जिसे पढ़ते-पढ़ते
किसी ने अचानक बंद कर दिया हो।
मैं तुम्हारे उदास चेहरे की तहरीर पढ़ लेता हूँ—
उसमें लिखे हुए
बीते दिनों के धुंधले अक्षर,
कुछ टूटे हुए ख़्वाब,
और कुछ ऐसे सवाल
जो अब भी जवाब ढूँढ रहे हैं।
पर यक़ीन मानो
तुम्हारी इस ख़ामोशी में भी
एक अजीब-सी रोशनी है,
जैसे अँधेरे कमरे में
खिड़की से आती हुई
सुबह की पहली किरण।
और शायद इसी लिए
मैं तुम्हारे उदास चेहरे की तहरीर
बार-बार पढ़ता हूँ
क्योंकि उसमें
दुख के साथ-साथ
एक छुपी हुई उम्मीद भी लिखी है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,
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