होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Monday, 30 March 2026

प्यास के ख़िलाफ़ साज़िश

 प्यास के ख़िलाफ़ साज़िश


यह साज़िश

बहुत धीरे-धीरे रची गई

इतनी ख़ामोशी से

कि किसी को

प्यास लगना भी

अपराध लगने लगा।

पहले

उन्होंने पानी को

नाम दिया

“रिसोर्स”

फिर

उसे बाँट दिया

बोतलों में,

ब्रांडों में,

और कीमतों में।

अब

प्यास

कोई एहसास नहीं रही,

एक “डिमांड” बन गई है

जिसे

मार्केट पूरा करता है।

नदियों से कहा गया

“बहना बंद करो,

तुम्हें पाइपलाइनों में

चलना होगा।”

बारिश से कहा गया

“जहाँ ज़रूरत हो

वहीं बरसो,

बाक़ी जगह

तुम्हारी कोई ज़रूरत नहीं।”

बादलों को

ठेके पर दे दिया गया

और आकाश

किसी कंपनी का

ऑफ़िस बन गया।

धरती की कोख से

खींच लिया गया पानी

इतना कि

उसकी नसें

सूखने लगीं।

और मनुष्य

वह

अपनी ही बनाई हुई

इस प्यास को

प्लास्टिक की बोतल में

भरकर

पीता रहा

बिना समझे

कि वह

पानी नहीं,

अपना भविष्य पी रहा है।

किसी गाँव में

एक बूढ़ा

कुएँ के पास बैठा था

सूखी रस्सी को

बार-बार खींचता,

और हर बार

खाली लौट आता।

उसने आसमान से पूछा

“क्या अब

प्यास भी

खरीदनी पड़ेगी?”

आसमान चुप रहा

शायद

उसकी आवाज़ भी

किसी ने

किराए पर ले ली थी।

शहरों में

फव्वारे नाच रहे थे,

लॉन हरे थे,

और लोग

“वाटर क्राइसिस” पर

सेमिनार कर रहे थे।

पर कहीं दूर

एक बच्चा

अपनी सूखी जीभ से

होंठ चाटते हुए

सो गया

बिना यह जाने

कि उसकी नींद में

कोई सपना भी नहीं आएगा,

क्योंकि सपनों को भी

थोड़ा पानी चाहिए।

यह साज़िश

इतनी गहरी है

कि अब

प्यास को ही

गलत ठहराया जा रहा है।

कहा जा रहा है

“कम पियो,

कम माँगो,

कम जियो…”

पर

एक दिन

जब धरती

आख़िरी बार

करवट लेगी,

तो वह पूछेगी—

“तुमने मेरे पानी से

क्यों डरना शुरू कर दिया?”

और उस दिन

अगर जवाब नहीं मिला

तो

प्यास

सिर्फ़ एहसास नहीं रहेगी,

एक विद्रोह बन जाएगी

जो

हर बाँध तोड़ देगी,

हर बोतल फोड़ देगी,

और

हर साज़िश को

बहा ले जाएगी।

तब

पानी नहीं बहेगा

न्याय बहेगा।

मुकेश्,,, 

No comments:

Post a Comment