“जब शांति म्यूज़ियम में रख दी गई”
एक दिन
घोषणा हुई
कि
“शांति” अब
इस दुनिया में नहीं मिलती,
इसलिए
उसे सुरक्षित रखने के लिए
म्यूज़ियम में रख दिया गया है।
लोग
लाइन लगाकर
देखने आने लगे
बच्चे पूछते—
“पापा,
ये शांति क्या होती है?”
पिता
थोड़ा झेंपते,
थोड़ा हँसते,
और कहते
“बेटा,
ये बहुत पुरानी चीज़ है…
अब इस्तेमाल में नहीं आती।”
काँच के एक बड़े-से बॉक्स में
रखी थी शांति
धूल जमी हुई,
थोड़ी पीली,
थोड़ी थकी हुई।
उसके पास
एक बोर्ड लगा था
“कृपया इसे छुएँ नहीं,
यह बहुत नाज़ुक है।”
पास ही
एक और सेक्शन था
“युद्ध के आधुनिक मॉडल”
जहाँ
बटन दबाते ही
मिसाइलें उड़ती थीं,
शहर जलते थे,
और स्क्रीन पर
तालियाँ बजती थीं।
लोग
वहाँ ज़्यादा देर रुकते
सेल्फ़ी लेते,
वीडियो बनाते,
और लिखते
“#Power #Nation #Victory”
शांति के सामने
बस कुछ बूढ़े खड़े होते
उनकी आँखों में
कुछ धुँधला-सा तैरता,
जैसे
उन्हें याद आ रहा हो
कोई पुराना गीत,
कोई भूला हुआ आलिंगन।
एक कोने में
एक बच्चा
चुपचाप खड़ा था
उसने धीरे से
काँच पर हाथ रखा,
और पूछा
“क्या यह
साँस लेती है?”
कोई जवाब नहीं आया
सिर्फ़
एक हल्की-सी दरार पड़ी
काँच पर।
अचानक
अलार्म बज उठा
“सावधान!
शांति को ख़तरा है!”
सुरक्षा गार्ड दौड़े,
बच्चे को हटाया गया,
और
काँच को फिर से
मज़बूत कर दिया गया
ताकि
शांति सुरक्षित रहे
इस खतरनाक दुनिया से।
बाहर
तोपें गरज रही थीं,
नेताओं के भाषणों में
आग बरस रही थी,
और
हर देश
खुद को
सबसे शांतिप्रिय साबित कर रहा था।
रात को
जब म्यूज़ियम बंद हुआ
शांति ने
धीरे से आँखें खोलीं,
और फुसफुसाई
“मैं यहाँ सुरक्षित नहीं हूँ…
मैं तो
दिलों में बसती थी कभी…”
पर
अब दिल
खाली थे,
या
भरे हुए थे
बारूद से।
और अगली सुबह
म्यूज़ियम के बाहर
एक नया बोर्ड लगा था
“नई प्रदर्शनी:
‘मानवता’ — लुप्तप्राय प्रजाति”
मुकेश्,,,,
No comments:
Post a Comment