ढोल की थाप और धड़कन का हुड़दंग
ढोल की पहली थाप गिरी
तो लगा जैसे आसमान ने
फागुन की चूनर झटका दी हो।
गली-गली रंग की धूल उड़ी,
अबीर की बदली छाई,
और उस शोर में
मेरी धड़कन ने
अपना अलग ही हुड़दंग रच दिया।
मृदंग की लय तेज़ हुई
तो रगों में भी रक़्स-सा उठा,
तुम्हारी हँसी ने जैसे
ताल पकड़ ली
और दिल ने संगत दे दी।
भीड़ में कितने चेहरे थे,
कितनी आवाज़ें, कितनी पुकारें,
पर हर थाप के दरमियाँ
मैं सिर्फ़ तुम्हारी आहट सुनता रहा।
तुमने जब रंग उछाला
तो वह हवा में नहीं,
सीधे मेरी नब्ज़ पर आ गिरा
और वहाँ से
इश्क़ की धुन बजने लगी।
ढोल बजते रहे देर तलक,
शहर झूमता रहा बेख़ुदी में,
और मेरी धड़कन
उस हुड़दंग में
तुम्हारे नाम का आलाप दोहराती रही।
मुकेश ,,,,,,,,,
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