कॉस्मिक धड़कनें
ब्रह्मांड मौन नहीं है
वह धड़कता है।
पर उसकी धड़कन
कानों से नहीं,
समीकरणों और तरंगों से सुनी जाती है।
कभी वह स्पंदन था
आदिम विस्तार का
जब स्थान स्वयं फैल रहा था,
और ताप की मद्धिम लहर
आज भी पृष्ठभूमि में गूँज रही है।
कभी वह धड़कन है
पल्सर की
न्यूट्रॉन तारे का तीव्र घूर्णन,
जो नियमित अंतराल पर
रेडियो-तरंगों का संकेत भेजता है,
मानो अंधकार में
कोई प्रकाश-घंटी बज रही हो।
कभी वह कंपन है
गुरुत्वीय तरंगों का
जब दो ब्लैक होल
आपस में विलीन होते हैं,
और स्थान-काल का तंतु
क्षण भर को काँप उठता है।
इन धड़कनों को
मानव कान नहीं सुन सकता,
पर डिटेक्टर
उनके सूक्ष्म कंपन दर्ज करते हैं
प्रकाश-वर्षों दूर हुई घटना का
यहाँ तक पहुँचा संकेत।
आकाशगंगाओं की परिक्रमा,
तारों का जन्म और विलय,
डार्क मैटर का मौन गुरुत्व
सब मिलकर
एक विशाल लय रचते हैं।
और फिर
हमारी अपनी धड़कन
सीने में चलती हुई
वही तत्व लिए,
जो कभी किसी तारे में बने थे।
क्या यह संभव है
कि हमारी नाड़ी
उस महान लय की
सूक्ष्म प्रतिध्वनि हो?
कॉस्मिक धड़कनें
किसी एक क्षण की नहीं
वे निरंतरता हैं।
जन्म से मृत्यु तक,
विस्तार से संकुचन तक।
ब्रह्मांड
एक स्थिर चित्र नहीं,
एक जीवित ताल है
जिसकी प्रत्येक धड़कन
कहती है
अस्तित्व
अब भी जारी है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,
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