चेतना और ब्रह्मांड का विस्तार
ब्रह्मांड
कभी स्थिर नहीं रहा
वह निरंतर फैलता रहा है,
जैसे समय की साँस
हर क्षण
थोड़ी और गहरी हो रही हो।
तारे जन्म लेते हैं,
आकाशगंगाएँ दूर होती जाती हैं,
और अंतरिक्ष
अपनी सीमाओं को
लगातार आगे बढ़ाता रहता है।
पर इसी विशाल विस्तार के बीच
एक और रहस्य छिपा है
चेतना।
मनुष्य की आँखों में
जब पहली बार
आकाश का प्रतिबिंब उतरा,
तभी
ब्रह्मांड ने
अपने ही विस्तार को
पहली बार महसूस किया।
क्योंकि
बिना चेतना के
तारे सिर्फ़ जलते रहते,
और आकाशगंगाएँ
खामोशी से घूमती रहतीं।
पर जब
किसी मन ने पूछा
“यह सब क्या है?”
तभी
ब्रह्मांड की कहानी
एक नए अध्याय में प्रवेश कर गई।
चेतना
मानो
उस अनंत विस्तार का
एक छोटा-सा दर्पण है।
उसमें
तारों की रोशनी भी उतरती है
और
समय की गहराई भी।
वैज्ञानिक
दूरबीनों से
ब्रह्मांड का मानचित्र बनाते हैं,
और दार्शनिक
चेतना की गहराई को नापने की कोशिश करते हैं।
दोनों की यात्राएँ
अलग-अलग लगती हैं,
पर अंततः
वे एक ही प्रश्न के पास पहुँचती हैं—
क्या
चेतना
सिर्फ़ ब्रह्मांड का परिणाम है,
या
वह उसी विस्तार का
सबसे सूक्ष्म रूप है?
शायद
चेतना
ब्रह्मांड का वह क्षण है
जब अस्तित्व
स्वयं को पहचानने लगता है।
जैसे
समुद्र की एक लहर
अचानक यह जान ले
कि वह समुद्र से अलग नहीं।
मनुष्य
उसी पहचान का यात्री है।
उसकी चेतना
धीरे-धीरे
अपने सीमित अनुभवों से निकलकर
अनंत की ओर फैलती है
विज्ञान में,
कला में,
ध्यान में,
और
प्रेम में।
और हर बार
जब वह किसी नए सत्य को समझता है,
तो मानो
ब्रह्मांड का विस्तार
उसके भीतर भी
थोड़ा और बढ़ जाता है।
शायद
चेतना और ब्रह्मांड का रहस्य
यही है
कि दोनों
एक-दूसरे से अलग नहीं,
बल्कि
एक ही अनंत यात्रा के
दो प्रतिबिंब हैं।
ब्रह्मांड
बाहर फैलता रहता है,
और चेतना
भीतर।
और मनुष्य
इन दोनों के बीच खड़ा
एक अद्भुत साक्षी है
जो
आकाश की गहराई में भी झाँकता है
और
अपने ही मन की निस्तब्धता में भी।
शायद
यही वह बिंदु है
जहाँ
चेतना और ब्रह्मांड
एक ही विस्तार में
धीरे-धीरे
मिल जाते हैं।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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