अस्तित्व की अदृश्य संरचना
पहली नज़र में
यह संसार
ठोस और स्पष्ट दिखाई देता है
पर्वत, नदियाँ, तारे,
और मनुष्य की व्यस्त सभ्यताएँ।
पर जब दृष्टि
थोड़ी और गहराई में उतरती है,
तो पता चलता है
जो दिखाई देता है
वह संपूर्ण नहीं है।
हर रूप के पीछे
एक अदृश्य व्यवस्था छिपी है
एक सूक्ष्म संरचना,
जिस पर
अस्तित्व की पूरी इमारत खड़ी है।
एक बीज को देखिए
उसकी छोटी-सी देह में
पूरा वृक्ष छिपा होता है।
पर वह वृक्ष
केवल लकड़ी और पत्तों का आकार नहीं,
वह
एक अदृश्य क्रम का परिणाम है।
कणों की दुनिया में
और भी गहरी कहानी चलती है।
अणु, परमाणु,
और उनसे भी सूक्ष्म कण
सब एक ऐसी लय में बँधे हैं
जिसे आँखें नहीं देख सकतीं।
मानो
ब्रह्मांड की किसी
मौन गणित ने
उन्हें एक निश्चित क्रम दे दिया हो।
दार्शनिकों ने
इसे ऋत कहा,
वैज्ञानिकों ने
प्राकृतिक नियम।
नाम अलग हैं,
पर संकेत
एक ही रहस्य की ओर जाते हैं—
कि
अस्तित्व का आधार
सिर्फ़ दृश्य नहीं,
अदृश्य भी है।
मनुष्य का जीवन भी
इसी संरचना का हिस्सा है।
उसके विचार,
उसकी स्मृतियाँ,
उसकी चेतना—
ये सब
ऐसे सूक्ष्म सूत्रों से जुड़े हैं
जिन्हें शब्दों में पूरी तरह बाँधना कठिन है।
कभी
एक विचार
पूरी सभ्यता बदल देता है,
कभी
एक भावना
जीवन की दिशा मोड़ देती है।
यह सब
किसी गहरी अदृश्य व्यवस्था का संकेत है।
शायद
अस्तित्व की यह संरचना
किसी वास्तुकार की बनाई हुई इमारत नहीं,
बल्कि
एक जीवित लय है
जो हर कण में
और हर चेतना में
समान रूप से धड़कती है।
जब मनुष्य
इस लय को समझने की कोशिश करता है,
तो विज्ञान जन्म लेता है।
और जब वह
उसी लय को महसूस करने की कोशिश करता है,
तो अध्यात्म।
दोनों की यात्राएँ
अलग दिखाई देती हैं,
पर दोनों
उसी अदृश्य संरचना के
भेद खोलने का प्रयास हैं।
शायद
अस्तित्व का सबसे गहरा रहस्य
यही है
कि
जो सबसे अधिक वास्तविक है,
वह अक्सर
आँखों से दिखाई नहीं देता।
वह
सूत्रों में छिपा होता है,
लयों में,
और
उस मौन संतुलन में
जिस पर
पूरा ब्रह्मांड टिका हुआ है।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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