भाप का कुंडल
तुम्हारी चाय से उठी भाप
धीरे-धीरे
तुम्हारे कानों के पास
एक कुंडल-सा बनाती है—
और मैं सोचता हूँ,
कहीं वह मैं ही तो नहीं।
जो हर सुबह
तुम्हारी उँगलियों की गरमी में
घुलकर उठता है,
और तुम्हारे चेहरे के पास
एक हल्की-सी धुंध बन जाता है।
तुम कप को
धीरे से होंठों तक लाती हो,
और उस पल
दुनिया जैसे
थोड़ी देर के लिए
रुक जाती है।
खिड़की के बाहर
धूप की एक पतली लकीर है,
अंदर
तुम्हारी चाय की महक
और तुम्हारी ख़ामोश मुस्कान।
मैं उस भाप की तरह
तुम्हारे पास रहना चाहता हूँ
नज़र भी आऊँ
और छूते ही
तुम्हारी साँसों में
गुम भी हो जाऊँ।
मुकेश ,,,
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