सब कुछ “कनेक्टेड” है अब
चारों तरफ़ इसी की धूम
यही एक विचार हवा में
यही एक चीज़ बाज़ार में
यही मोबाइल में
यही लैपटॉप में
यही ऑफिस में
यही बेडरूम में
यही मेट्रो में
यही मंदिर में
यही श्मशान में
ऐसा लगता है
जैसे इंसान ने
पहली बार
एक-दूसरे से जुड़ना सीखा है
जबकि
सदियों से लोग
बिना नेटवर्क के
दिलों में बसते आए हैं
सुबह उठते ही
चेहरा नहीं देखते हम
नोटिफिकेशन देखते हैं
कोई “गुड मॉर्निंग” नहीं कहता
सब
“स्टेटस” डालते हैं
जो भी पूछो
जिससे भी पूछो
जिस बारे में भी पूछो
“ऑनलाइन हो?”
माँ पास बैठी है
बेटा
दूर बैठा है
दोनों
एक ही घर में
“टाइपिंग…” कर रहे हैं
दोस्त
दोस्त नहीं रहे
“फॉलोअर्स” बन गए हैं
रिश्ते
रिश्ते नहीं रहे
“चैट्स” बन गए हैं
मुलाकातें
मुलाकातें नहीं रहीं
“वीडियो कॉल” बन गई हैं
इंस्टाग्राम खोलो
हर कोई
खुश है
व्हाट्सएप खोलो
हर कोई
बिज़ी है
फेसबुक खोलो
हर कोई
यादों में ज़िंदा है
और
अपने भीतर झाँको
तो
कोई भी
साथ नहीं है
एक आदमी
हज़ार लोगों से
जुड़ा हुआ है
और
एक भी इंसान से
नहीं जुड़ा
“लास्ट सीन”
हमारी मौजूदगी का सबूत है
“ब्लू टिक”
हमारी अहमियत का पैमाना
किसी के कंधे पर सिर रखकर
रोने की जगह
अब
इमोजी भेजे जाते हैं
😂
😭
❤️
तीन चिन्हों में
पूरा दिल समेट दिया गया है
एक दस साल का बच्चा
पूछता है
“पापा, ऑफलाइन क्या होता है?”
पापा सोचते हैं
बहुत देर तक
किसी के कमरे में
अब सन्नाटा नहीं होता
हर वक्त
कोई-न-कोई आवाज़ चलती रहती है
लेकिन
अंदर
एक गहरा
भयानक
अकेलापन बैठा है
ऐसा लगता है
जैसे इंसान
धीरे-धीरे
“डेटा” बनता जा रहा है
और मैं
इस डिजिटल भीड़ में
एक सादा-सा सवाल लिए भटक रहा हूँ
“क्या किसी को
वाक़ई मेरी ज़रूरत है
या सिर्फ़ मेरे ‘ऑनलाइन’ होने की?”
मेरे भीतर
कोई पुराना इंसान
धीरे-धीरे बुझ रहा है
जो
दरवाज़ा खटखटाकर
मिलने जाता था
अब
दरवाज़े नहीं खुलते
लिंक खुलते हैं
हम सब
जुड़े हुए हैं दोस्तों
और
शायद
इसीलिए
सबसे ज़्यादा टूटे हुए हैं
कविता :
“इसे कविता मत कहिए
यह भी शायद
एक नोटिफिकेशन है दोस्तों।”
मुकेश ,,,,,,,,,,
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