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Tuesday, 31 March 2026

सब कुछ ‘सफलतामय’ है अब

सब कुछ “सफलतामय” है अब

चारों तरफ़ इसी की धूम

यही एक विचार हवा में

यही एक चीज़ बाज़ार में


यही स्कूल में

यही कोचिंग में

यही ऑफिस में

यही कॉलोनी में

यही गाँव में

यही शहर में

यही महानगर में


ऐसा लगता है

जैसे इंसान नहीं

सिर्फ़ “सीवी” पैदा हो रहे हैं


माँ कहती है

बेटा कुछ बन जाओ


बाप कहता है

नाम रोशन करो


टीचर कहता है

टॉपर बनो


कोचिंग कहती है

रैंक लाओ


कॉरपोरेट कहता है

खुद को बेचो

और मुस्कुराते रहो


जो भी पूछो

जिससे भी पूछो

जिस बारे में भी पूछो


“कितना कमाते हो?”


बचपन

ट्यूशन की मेज़ पर मर गया


जवानी

लैपटॉप के स्क्रीन में फँस गई


बुढ़ापा

पेंशन और प्रॉपर्टी के बीच

झूल रहा है


इंस्टाग्राम खोलो

तो हर कोई

सफल है


फेसबुक खोलो

तो हर कोई

खुश है


लिंक्डइन खोलो

तो हर कोई

प्रेरणादायक है


और

ज़िंदगी खोलो

तो हर कोई

थका हुआ है


मोटिवेशनल स्पीकर चिल्लाता है


“जागो!”

“भागो!”

“जीत लो दुनिया!”


और

भीतर बैठा आदमी पूछता है


“थोड़ा सो भी लूँ?”


दोस्त

दोस्त नहीं रहे


नेटवर्क बन गए हैं


रिश्ते

रिश्ते नहीं रहे


“कॉन्टैक्ट्स” बन गए हैं


मुलाकातें

मुलाकातें नहीं रहीं


“मीटिंग्स” बन गई हैं


किसी के कंधे पर सिर रखकर

रोने की जगह

अब

“स्टेटस अपडेट” है


एक दस साल का बच्चा

पूछता है


“पापा, पैशन क्या होता है?”


पापा कहते हैं—

“जिससे पैसे आएं”


किसी के चेहरे पर

अब मेहनत का पसीना नहीं है


सबके माथे पर

“परफॉर्मेंस” का पॉलिश है


ऐसा लगता है

जैसे इंसान

धीरे-धीरे

“प्रोजेक्ट” बनता जा रहा है


डेडलाइन के साथ


और मैं


इस भीड़ में

एक बेकार-सा सवाल लिए घूम रहा हूँ


“क्या बिना जीते भी

जिया जा सकता है?”


मेरे भीतर

कोई पुराना आदमी

धीरे-धीरे मर रहा है


जो कहता था


चलो

आज कुछ न करें


अब

कुछ न करना

सबसे बड़ा अपराध है


हम सब

भाग रहे हैं दोस्तों


कहाँ

ये किसी को नहीं पता


हम सब जीत रहे हैं दोस्तों


और

शायद

इसीलिए

सबसे बुरी तरह हार रहे हैं


मुकेश ,,,,,,,,,,,

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