आकाश की गवाही
मैं,
आकाश,
आज
गवाही देने आया हूँ।
न किसी पक्ष में,
न विपक्ष में
बस
सच के पक्ष में।
मैंने
सब कुछ देखा है
पहली आग,
पहला घर,
पहला सपना…
और
पहला विश्वासघात भी।
जब
तुमने
धरती को
माँ कहा था,
तब भी
मैं ऊपर था
और जब
उसे
टुकड़ों में बाँट दिया,
तब भी
मैं यहीं था।
मैंने देखा
कैसे
पेड़ों को काटते वक़्त
तुम्हारी कुल्हाड़ी
कभी नहीं काँपी,
और
कैसे
नदियों को ज़हर देते हुए
तुम्हारी आँख
कभी नहीं भीगी।
तुम
ऊपर देखते थे
और कहते थे,
“ईश्वर वहीं रहता है…”
पर
तुमने
कभी यह नहीं देखा
कि
मैं
तुम्हारी हर हरकत का
खामोश साक्षी हूँ।
तुमने
मेरे सीने में
धुआँ भर दिया,
मेरे नीले रंग को
धुंधला कर दिया,
और
मेरे सितारों को
छिपा दिया
अपनी ही रोशनी में।
तुमने सोचा
कि
तुम बहुत आगे बढ़ गए हो,
कि
तुमने मुझे
छू लिया है
पर
तुमने
सिर्फ़
मशीनें भेजी हैं
मेरी ओर,
खुद को नहीं।
आज
जब अदालत लगी है
और
तुम
कटघरे में खड़े हो,
तो
मुझसे पूछा गया
“क्या मनुष्य दोषी है?”
मैं
कुछ पल चुप रहा
क्योंकि
मेरी गवाही में
सिर्फ़ अपराध नहीं,
कुछ यादें भी थीं
एक बच्चा
जो मुझे देखकर
हँसता था,
एक प्रेमी
जो सितारों में
अपना नाम ढूँढता था,
एक बूढ़ा
जो हर शाम
मुझे धन्यवाद कहता था।
मैंने
धीरे से कहा
“मनुष्य…
दोषी है
पर
पूरी तरह नहीं।”
अदालत में
सन्नाटा छा गया।
मैंने आगे कहा
“उसने
बहुत कुछ तोड़ा है,
पर
उसमें
अब भी
कुछ बचा है
जो
फिर से बना सकता है।”
जज ने पूछा
“तो सज़ा क्या हो?”
मैंने
अपनी विशालता में
थोड़ा-सा झुककर कहा
“उसे
एक और मौका दिया जाए
पर इस बार
कोई चेतावनी नहीं होगी,
कोई दूसरा अवसर नहीं।”
और फिर
मैं
चुप हो गया
जैसे
गवाही पूरी हो चुकी हो।
अब
निर्णय
तुम्हारे हाथ में है
तुम
मेरे नीचे
कैसे जीना चाहते हो?
क्योंकि
मैं तो
फिर भी रहूँगा
नीला,
अनंत,
और
खामोश
पर
तुम्हारा होना
तुम्हारे ही निर्णय पर टिका है।
मुकेश ,,,,,
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