अंगूठी खो जाने की जगह खोया हुआ संदेश
कभी
वन की पगडंडी पर
एक अंगूठी खो गई थी
और उसके साथ
स्मृति भी।
आज
नदी नहीं बहती,
न अंगूठियाँ गिरती हैं
बस
मोबाइल की स्क्रीन पर
कभी-कभी
एक संदेश
भीड़ में खो जाता है।
शायद
दुष्यंत ने
लिखा भी होगा कुछ,
पर
नेटवर्क की हलचल में
वह पहुँच नहीं पाया।
समय बदल गया है
पर भूल जाने की कहानी
अब भी
किसी न किसी रूप में
दोहराई जाती है।
कभी
अंगूठी खोती थी,
आज
एक संदेश।
मुकेश ,,,,
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