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Saturday, 14 March 2026

आश्रम की शांति और महानगर का शोर

 आश्रम की शांति और महानगर का शोर


कभी

वन के आश्रम में

शाम उतरती थी

बहुत धीरे—


पत्तों की सरसराहट,

नदी की हल्की ध्वनि,

और दूर तक

फैली हुई शांति।


आज

महानगर की शाम है

सड़कें बोलती हैं,

गाड़ियाँ चिल्लाती हैं,

और रोशनी

आसमान तक फैल जाती है।


फिर भी

इस शोर के बीच

कभी-कभी

मन के भीतर

एक छोटा-सा आश्रम

अब भी बसता है—


जहाँ

थोड़ी देर के लिए

सब कुछ

फिर से

शांत हो जाता है।


मुकेश ,,,,

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