आश्रम की शांति और महानगर का शोर
कभी
वन के आश्रम में
शाम उतरती थी
बहुत धीरे—
पत्तों की सरसराहट,
नदी की हल्की ध्वनि,
और दूर तक
फैली हुई शांति।
आज
महानगर की शाम है
सड़कें बोलती हैं,
गाड़ियाँ चिल्लाती हैं,
और रोशनी
आसमान तक फैल जाती है।
फिर भी
इस शोर के बीच
कभी-कभी
मन के भीतर
एक छोटा-सा आश्रम
अब भी बसता है—
जहाँ
थोड़ी देर के लिए
सब कुछ
फिर से
शांत हो जाता है।
मुकेश ,,,,
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