दुष्यंत की स्मृति और आधुनिक जीवन की व्यस्तता
सुबह से
शहर भाग रहा है
घड़ियों की सूइयों के साथ
लोग भी
तेज़-तेज़ चल रहे हैं।
काग़ज़ों, मीटिंगों
और फ़ाइलों के बीच
कहीं
एक पुरानी स्मृति
चुपचाप बैठी है।
कभी-कभी
अचानक
दुष्यंत को याद आता है
वन की वह दोपहर,
और शकुंतला की
धीमी-सी मुस्कान।
पर तभी
फ़ोन की घंटी
फिर बज उठती है,
और शहर
उसे
वापस अपने शोर में
खींच लेता है।
स्मृति
फिर भी
कहीं अंदर
ठहरी रहती है
जैसे
व्यस्त जीवन के बीच
एक छोटा-सा वन
अब भी
साँस ले रहा हो।
मुकेश ,,,,,,,
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