शकुंतला का आज के शहर में इंतज़ार
भीड़ से भरे इस शहर में
एक लड़की बैठी है
पार्क की बेंच पर
शाम ढलने के इंतज़ार में।
उसके पास
न कोई आश्रम है,
न कण्व ऋषि की छाया
बस
मोबाइल की स्क्रीन पर
टिकी हुई निगाह है।
वह बार-बार देखती है
कि कहीं
कोई संदेश तो नहीं आया।
शायद
आज का दुष्यंत
किसी मीटिंग में व्यस्त है,
या
यादों की कोई अंगूठी
फिर कहीं खो गई है।
पर इंतज़ार
आज भी वैसा ही है
जैसा कभी
वन की पगडंडी पर बैठी
शकुंतला किया करती थी।
समय बदल गया है,
शहर बदल गए हैं
पर प्रेम का इंतज़ार
अब भी
उतना ही
धीमा और गहरा है।
मुकेश ,,,,,
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