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Saturday, 14 March 2026

चारुदत्त और वसंतसेना — आज के समय में

 चारुदत्त और वसंतसेना — आज के समय में


नगर अब भी वही है

बस गलियाँ बदल गई हैं।


कभी रथों की आहट थी,

अब शीशों की इमारतों में

लिफ़्टों की साँस चलती है।


चारुदत्त अब भी रहता है कहीं

ईमान की थोड़ी-सी धूप लिए,

जेब में कम

और आत्मा में बहुत अधिक।


वसंतसेना भी है

भीड़ में चमकती हुई,

पर भीतर कहीं

एक सच्चे स्पर्श की तलाश में।


वह पूछती है—

“धन से भरे इस नगर में

क्या कोई हृदय भी बचा है?”


चारुदत्त मुस्कराता है—

“हृदय तो हैं,

बस लोग उन्हें

लाभ-हानि के खातों में

लिखना भूल गए हैं।”


और तभी

समय की भीड़ में

दो प्राचीन आत्माएँ

फिर से मिलती हैं


जैसे

मृच्छकटिक का छोटा-सा रथ

आज भी

मानवता की गली से

धीरे-धीरे गुजर रहा हो।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

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