शकुंतला और दुष्यंत
(कालिदास की काव्य-भावना से प्रेरित एक आधुनिक नज़्म)
वन की शांत छाया में
जब शकुंतला ने
किसी अनजाने पथिक को देखा
हवा
क्षण भर के लिए
रुक-सी गई थी।
दुष्यंत की आँखों में
राज्य का वैभव नहीं,
एक नई जिज्ञासा थी
और शकुंतला की
नत पलकें
वन के फूलों की तरह
धीरे-धीरे खिल रही थीं।
वक़्त बीतता गया,
राज्य और वन
अपने-अपने रास्तों पर चले गए
पर
प्रेम की वह पहली दृष्टि
आज भी
किसी ऋतु की तरह
कविता में लौट आती है।
मुकेश्,,,,,
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