पुरानी दीवार पर उभरती काई की हरियाली
पुरानी दीवार पर
धीरे-धीरे
काई उभर रही है
जैसे वक़्त
अपना रंग छोड़ रहा हो।
नमी ने
पत्थर को छुआ होगा,
और कहीं भीतर
कुछ हरा जाग गया।
कोई शोर नहीं,
कोई जल्दबाज़ी नहीं
बस
एक चुप उगना।
मनोविज्ञान कहता है
जहाँ ठहराव होता है,
वहीं
नई परतें जन्म लेती हैं।
शायद इसलिए
पुरानी दीवारें
कभी सच में बूढ़ी नहीं होतीं
उनमें
हरियाली
धीरे-धीरे
जीना सीखती रहती है…।
मुकेश ,,,,,,,
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