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Monday, 2 March 2026

सांझ की चाय और तुम्हारे होंठों की भाप

सांझ की चाय और तुम्हारे होंठों की भाप

सांझ ढली तो आँगन में

धूप की आख़िरी किरण ठहरी रही,

मैंने चूल्हे पर रखी केतली से

दो कप ख़ामोशी उतारी।


चाय की सतह से उठती भाप

धीरे-धीरे हवा में घुली,

और उसी में

तुम्हारे होंठों की नर्म हरारत

मुझे छूकर गुज़र गई।


तुमने कप थामा

तो उँगलियों से पहले

तुम्हारी मुस्कान ने

मुझे थाम लिया।


भाप का एक हल्का सा बादल

तुम्हारे चेहरे के पास ठहरा,

जैसे कोई अधूरी बात

लफ़्ज़ बनने से पहले ही

महक उठी हो।


हमने कुछ कहा नहीं,

बस चाय की चुस्कियों के दरमियाँ

धड़कनों की आवाजाही चलती रही।


सांझ की वह मामूली-सी घड़ी

एक रूहानी लम्हा बन गई 

जहाँ चाय की भाप

तुम्हारे होंठों से उठकर

मेरे दिल तक आती रही।


मकेश ,,,,,,,,,,, 

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