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Monday, 2 March 2026

रेत पर गिरा पानी और तुम्हारा ठहरा हुआ नाम

 रेत पर गिरा पानी और तुम्हारा ठहरा हुआ नाम

रेत पर गिरा पानी

जैसे पल भर को ठहरकर

अपनी ही प्यास में खो जाए

वैसे ही तुम

मेरी स्मृतियों की धूप में

एक ठंडी लकीर बनकर उतरते हो।


तुम्हारा नाम

होठों तक आता है

पर आवाज़ नहीं बनता,

बस भीतर कहीं

धीमे-धीमे भीगता रहता है—

जैसे रेत की तहों में

कोई पारदर्शी राज़।


मैंने कई बार चाहा

उसे हवा के हवाले कर दूँ,

पर हर बार

वह नाम

मेरे सीने की धड़कनों में

एक शांत सरोवर-सा जम जाता है।


रेत सूख जाती है,

धूप बदल जाती है,

पर जो एक बार गिरा था

वह पानी

किसी अनदेखी गहराई में

अब भी तुम्हारा

ठहरा हुआ नाम है।


मुकेश ,,,,,,,,,,

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