रेत पर गिरा पानी और तुम्हारा ठहरा हुआ नाम
रेत पर गिरा पानी
जैसे पल भर को ठहरकर
अपनी ही प्यास में खो जाए
वैसे ही तुम
मेरी स्मृतियों की धूप में
एक ठंडी लकीर बनकर उतरते हो।
तुम्हारा नाम
होठों तक आता है
पर आवाज़ नहीं बनता,
बस भीतर कहीं
धीमे-धीमे भीगता रहता है—
जैसे रेत की तहों में
कोई पारदर्शी राज़।
मैंने कई बार चाहा
उसे हवा के हवाले कर दूँ,
पर हर बार
वह नाम
मेरे सीने की धड़कनों में
एक शांत सरोवर-सा जम जाता है।
रेत सूख जाती है,
धूप बदल जाती है,
पर जो एक बार गिरा था
वह पानी
किसी अनदेखी गहराई में
अब भी तुम्हारा
ठहरा हुआ नाम है।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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