रगों में उतरती सरगोशी
तुम्हारा नाम जब भी
हवा में हल्के से काँपता है,
मेरी नसों में कोई नर्म सी आहट
धीरे-धीरे उतरती है।
जैसे किसी ख़ामोश शाम में
अज़ान की लहर
दूर से आती हुई
दिल के दरवाज़े पर दस्तक दे।
तुम्हारी उँगलियों की याद
अब भी मेरी हथेलियों में धड़कती है,
और हर बार
लम्स का वो पहला लम्हा
रगों में फिर से आब हो उठता है।
मैं आँखें मूँद लेता हूँ —
कि यह सरगोशी कहीं टूट न जाए,
कि यह एहसास
बोले बिना ही पूरा रहे।
तुम सामने नहीं हो,
फिर भी तुम्हारा तसव्वुर
मेरी धमनियों में रौशनी की तरह बहता है,
और मैं
अपने ही जिस्म में
तुम्हारी मौजूदगी का
सफर तय करता रहता हूँ।
यह कैसी मोहब्बत है
जो आवाज़ नहीं करती,
पर रगों में उतरकर
इबादत बन जाती है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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