होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Monday, 2 March 2026

रंग, टेसू और तुम

 रंग, टेसू और तुम


होलिका की आँच पे चढ़ी

माटी की हांडी में

मैं टेसू के फूल घोलूँगा —

गुलाबजल की बूंद-बूंद से

रंग का रूहानी काढ़ा बनाऊँगा।


फिर उस तपिश से निकला रंग

अपनी हथेलियों में भरकर

तुम्हारे गुलाब से भी गुलाबी गालों पर

धीरे-धीरे मलूँगा 

जैसे कोई दुआ

चेहरे पे उतरती हो।


पिचकारी भर-भर

आसमान तक उछालूँगा रंग,

कि बादल भी आज

तुम्हारे नाम का अबीर बरसाएँ।


ढोल-मृदंग की थाप पे

जब धड़कनें रक़्स करेंगी,

मैं हुड़दंग में भी

बस तुम्हारा ही चेहरा ढूँढूँगा।


गली-गली फैलेगी

रंगों की बेख़ुदी,

और उस शोर में भी

तुम्हारी हँसी

सबसे साफ़ सुनाई देगी।


आज की होली में

मैं रंग नहीं,

अपना समूचा इश्क़ घोलूँगा 

कि जब शाम ढले

और पानी उतर जाए बदन से,

तुम्हारी रूह पर

मेरा रंग ठहरा रह जाए।


मुकेश ,,,,,,,

No comments:

Post a Comment