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Wednesday, 4 March 2026

आँखों की सीढ़ियाँ

 आँखों की सीढ़ियाँ


वह मुस्कुराती है

तो आँखों के कोरों पर

रेखाएँ नहीं बनतीं,

छोटी-छोटी सीढ़ियाँ उतर आती हैं


जिनसे

शाम धीरे-धीरे

मेरे भीतर चली आती है


उसकी पलकें

दरवाज़े नहीं होतीं,

हल्की-सी खुली खिड़कियाँ होती हैं


जिनसे

रोशनी

आवाज़ किए बिना

कमरे में फैल जाती है


और मैं

हर बार

बिना बुलावे के भी

ठहर जाता हूँ


जैसे कोई यात्री

रास्ते से ज़्यादा

उस ठहराव पर

विश्वास करने लगे।


मुकेश ,,,,,,,,,

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