“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
वह हँसती है
तो गालों में गड्ढे नहीं,
छोटे-छोटे कुएँ उतर आते हैं
जिनमें
धूप पानी बनकर चमकती है
और
मैं हर बार
बिना प्यास के भी
झुक जाता हूँ।
मुकेश ,,,,,,,
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