धूप और तुम्हारे बीच
धूप और तुम्हारे बीच
बस एक परदा-सा है
पतला, पारदर्शी,
जिसे तुम हर सुबह
आधे मन से हटाती हो।
धूप तुम्हें छूने आती है
जैसे कोई पुराना दोस्त,
और तुम
हल्की-सी झुँझलाहट में
उससे आँखें चुरा लेती हो।
मैं देखता हूँ
तुम्हारे बालों में
कैसे सुनहरी रेखाएँ उतरती हैं,
और तुम्हारी पलकें
किरणों का बोझ
धीरे से सह लेती हैं।
धूप और तुम्हारे बीच
कभी-कभी मैं भी होता हूँ
एक छाया की तरह,
जो तुम्हारे करीब रहकर
खुद को कम कर लेती है।
तुम मुस्कुराती हो
तो धूप ठहर जाती है,
जैसे उसे
अपना घर मिल गया हो।
तुम चुप होती हो
तो किरणें तुम्हारी उँगलियों पर
लकीरें खींचने लगती हैं—
जैसे समय
तुम्हारे नाम का हस्ताक्षर कर रहा हो।
धूप और तुम्हारे बीच
कोई दूरी नहीं,
सिर्फ़ एक नर्म-सी गर्माहट है
जो तुम्हारे गालों से होकर
मेरे दिल तक आती है।
और मैं सोचता हूँ
अगर कभी धूप कम पड़ जाए,
तो क्या तुम
अपनी मुस्कान से
दिन को पूरा कर दोगी?
मुकेश ,,,,,,,,,
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